अभी जब कुछ दिनों पहले जब मैंने अरुणा शानबाग के बारे में सुना तो काफी दुःख हुआ मन में वाही सवाल बार बार आ रहा था जो की सबके मन में था की किसी बलात्कारी को किसी लड़की की पूरी जिंदगी बर्बाद कर देने के लिए सिर्फ 7 साल की सजा ???? और उसके इस करतूतों की सजा अरुणा को 37 से मिल रही है.. वही जब अभी कुछ दिन पहले गोपालदास 27 साल बाद पाकिस्तान से अपने वतन लौटे जिन्होंने गलती से अपने देश की सीमा लांघी थी उन्हें पाक अदालत ने उम्र कैद की सजा मुक़र्रर कर दी गयी थी .
जहाँ एक तरफ वो बलात्कारी जिसने सिर्फ अपनी मर्ज़ी से इतनी बड़ी गलती करके अरुणा को मौत के मुंह में धकेल के सिर्फ कुछ सालो की सजा काट कर भी बेख़ौफ़ आज़ाद घूम रहा है..और दूसरी तरफ वो गोपालदास जिसने गलती से गलती की उसे अपने परिवार वालो से पुरे 27 साल के लिए दूर कर दिया गया था .और वापस आने पर पूरे मीडिया वालो ने उसे अपनी खबर के लिए निशाना बना लिया और और दूसरी तरफ वो बलात्कारी जिसके बारे में कुछ भी लोगो को तो क्या मीडिया को भी कुछ नहीं पता . दोनों ही मामलो में सजा तो मिली है गलती करने वाले को लेकिन क्या ये दोनों सजा मानवीय (सही) है क्या इसी तरह की सजा अगर असली मुजरिम को मिलती रही तो वो कही न कही निडर हो जायेगा ..ये कैसा इन्साफ है?? मुजरिम को मिलने वाली ये कैसी सजा है..???

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