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Tuesday, April 26, 2011

यह कैसा है इन्साफ ? यह कैसी है सजा ???
अभी जब कुछ दिनों पहले जब मैंने अरुणा शानबाग  के बारे में सुना तो काफी दुःख हुआ मन  में वाही सवाल बार  बार आ रहा था जो की सबके मन  में था की किसी बलात्कारी को किसी लड़की की पूरी जिंदगी बर्बाद कर देने के लिए सिर्फ 7 साल की सजा ???? और उसके इस करतूतों की सजा अरुणा  को 37 से  मिल रही है.. वही जब अभी कुछ  दिन पहले गोपालदास 27 साल बाद पाकिस्तान से अपने वतन लौटे जिन्होंने गलती से अपने देश की सीमा लांघी थी उन्हें पाक अदालत ने उम्र कैद की सजा मुक़र्रर कर दी गयी थी .
जहाँ  एक तरफ वो बलात्कारी जिसने सिर्फ अपनी मर्ज़ी से इतनी बड़ी गलती करके अरुणा को मौत के मुंह  में धकेल के सिर्फ  कुछ सालो की सजा काट कर भी बेख़ौफ़ आज़ाद घूम रहा है..और दूसरी तरफ वो  गोपालदास जिसने  गलती से गलती की उसे अपने परिवार वालो से पुरे 27 साल के लिए दूर कर दिया गया था .और वापस आने पर पूरे मीडिया वालो ने उसे अपनी खबर के लिए निशाना बना लिया और और दूसरी तरफ वो बलात्कारी जिसके बारे में कुछ भी लोगो को तो क्या मीडिया को भी कुछ नहीं पता . दोनों ही मामलो में सजा तो मिली है गलती करने वाले को  लेकिन क्या ये दोनों सजा मानवीय (सही) है क्या इसी तरह की सजा अगर असली मुजरिम को मिलती रही तो वो कही न कही निडर हो जायेगा ..ये कैसा इन्साफ है?? मुजरिम को मिलने वाली ये कैसी सजा है..???

Tuesday, March 22, 2011

भारत सरकार के ऊपर "साड़े साती "

मुझे बक्श दो ...........मैंने कुछ नहीं किया मैं बेक़सूर हूँ.........!!!!
पिछले साल से अब तक हो रहे एक के बाद एक भारत सरकार की करतूतों के खुलासे फिर चाहे वो  ऐ.रजा का "2जी स्पेक्ट्रम  आंवटन" हो या सुरेश कलमाड़ी का  "कॉमनवेल्थ गेम्स"हो या पीजे  थामस का "सीवीसी" मामला हो या फिर अब अखबारों और समाचारों  में सुर्खिया बटोरने वाला हमारे प्रधानमंत्री का "नोट के बदले वोट" मामला मानो भारत सरकार के ऊपर "साड़े साती " चल रहा हो.
सरकार की इन करतूतों की खिचड़ी बनते देख विकिलीक्स ने भी कई खुलासे करके खिचड़ी को और ज्यादा स्वादिष्ट बनाने  के लिए छौके का काम कर रहा है ..इन सभी खुलासे के बाद आम जनता भी आगे से सोचने पर मजबूर हो जाएगी की कौन  सही है कौन  गलत,किसको वोट देना है किसको नहीं . शुरू से अमेरिका की हमारे देश में दखलंदाज़ी दे  रहा  है.तथा उन्ही के बताये नक़्शे कदम पर अधिकांश सरकारे अपने आपको चला रही है .इससे तो यही पता चल रहा है की  हम अपने आपको कमजोर  दिखाना चाह रहे है इन सभी से  न सिर्फ  हमारे देश के नेता तो बिक  गए है.बल्कि देश की जनता काफी प्रभावित  हुई है.इन बातो का खुलासा विकिलीक्स द्वारा कई बार हुआ है  अमेरिका ने  साफ़ कहा है की  वित्त मंत्री प्रणब मुख़र्जी उन्हें पसंद नहीं है. वो वित्त मंत्री के रूप में  चितंबरम या मोंटेक सिंह आहलुवालिया को देखना चाहते थे .अमेरिका का इस तरह का हमारे देश में हस्तछेप.और कुछ हमारे देश के महान नेता लोग जो पता नहीं कितना पैसा कमाना चाहते है देश को खोखला कर दिया है ..इन सभी बड़े बड़े हादसों  के बाद तो लगता है की  जल्द ही भारत सरकार को किसी अच्छे पंडित को खोज कर अपने ऊपर चल रहे "साड़े साती" को हटवाने के लिए पूजा करानी होगी  होगा ताकि वो दोबारा अपने काले  काम का काला धन को पाने में सफल हो सके .... 

Thursday, March 17, 2011

जियो और जीने दो ....

"पैसे वालो फिर न करो यूँ अपनी नियत खोटी,मत निकालो ऐसे एक्स्चेंग ऑफर की छीन जाए हमारी रोजी रोटी " पहले आने वाला relience का सब्जी मार्केट हो या अब लोगो के बीच अपनी जगह बनाने वाला बिग बाज़ार का क्स्चेंग ऑफर.हो न हो दोनों ने कहीं न कहीं गरीबो की रोजी रोटी पर  मानो ग्रहण सा लगा रक्खा है.
आज सवेरे ही पापा ने जब रोड पर जा रहे  किसी कबाड़ी वाले को  कबाड़ का सामान देने के लिए आवाज़ लगाईं तो उसके मासूमियत भरे चेहरे और दर्द से केवल एक ही आवाज़  सुनाई दी "कि इन बिग बाज़ार वालो के  एक्स्चेंग ऑफर ने हमारा सारा धंधा चौपट कर दिया है बड़े लोगो ने घोटालो से पूरे देश को लूटने के बाद अब हम गरीबो को भी लूटने कि शाजिश बना ली है  हमारी थोड़ी सी कमाई पर भी मानो उनकी नियत कि खोट  नज़र आ रही है" और आम लोग भी हम गरीबो को लूटने में उन पैसे वालो  का पूरा साथ दे रहे हैं..
    बात तो कही  न कहीं सही भी है अब लोगो का इंटेरेस्ट  9 रुपये किलो के अखबार से ज्यादा 35 रुपये किलो के अखबार में ज्यादा होगा..कुछ भी हो जनाब! पैसा हर जगह बोलता है  पैसा कभी किसी को काटता नहीं है फिर चाहे वो अमीर का हो या गरीब का और जिसके पास जितना हो उतना ही कम रहता है.. हर कोई अपना ही फायदा चाहता है  अब देखो बिग बाज़ार  वाले अपने फायदे के लिए कबाड़ भी लेना शुरू कर दिए,तो बिग बाज़ार वाले तो सबसे बड़े कबाड़ी है और लोग  अपने फायदे के लिए उनको कबाड़  भी दे  रहे है  लोग अभी भी  इसी मुगालते में रह रहे है कि उन्हें कबाड़ कि जगह अच्छे.ब्रांडेड  कपडे मिल रहे है भले ही उससे ज्यादा पैसा मिलाकर ही क्यों न खरीदना पड़े..फिर अगर वो किसी शौपिंग मॉल से ख़रीदा हो तो फिर  लोगो के बीच अपनी कुछ अलग ही पहचान बनाने का तरीका का ..और लोगो को ये अच्छा भी लगता है वो इस बात से अनजान बनने कि कोशिश करते है कि घर से बिगबाजार तक अपने कबाड़ को ले जाने में उनका कितना पैसा खर्च हुआ . 
वैसे लोग भी कम चालाक नही है  वो यही चाहते है कि एक तीर से जितने ज्यादा निशाने लगे उतने लगा ले ..
फिर ऐसे तो उन्हें एक तीर से  तीन निशाने लगाने मौका मिल रहा है तो वो चूंक कैसे सकते है . पहला तो घर का कबाड़ भी साफ़ हो जाएगा ,दूसरा  मॉल का मॉल भी घूम लेंगे और तीसरा हाई-फाई जगह से कपडे भी खरीद लेंगे...जो सबके लिए थोडा मुश्किल होता है कि ऐसी हाई-फाई जगह से कपडे  या फिर कोई और सामान खरीदना  ऐसे में तो भैया आपकी रोजी रोटी में ग्रहण लगना स्वाभाविक है...
हम तो भैया यही कहेंगे रोड पे उन कबाड़ खरीदने वाले लोगो से कि अपने हक़ के लिए लड़ना सीखो.. जिस तरह जाट लोग अपने आरक्षण के हक़ के लिए लड़ रहे है .. तुम्हे भी ये सीखना पड़ेगा .. वो कहते है न " जहाँ सच नहीं चले वहां झूठ  सही, और जहाँ हक़ न मिले वहां लूट सही "  

Tuesday, March 15, 2011

seminar on "the power of marketing public relation"......

14 मार्च लखनऊ ! लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में  पी.जी.डी.पी.आर.ए के छात्र छत्राओ ने भव्य सेमिनार का आयोजन किया .
बीते दिन लखनऊ विश्वविध्यालय के  अध्यापक ए.के सेठ के सहयोग से  पी.जी.डी.पी.आर.ए के छात्र छत्राओ  द्वारा आयोजित सेमिनार में  " द पावर ऑफ़ मार्केटिंग पब्लिक रिलेशन " आधार बनाया गया .एक लम्बे अरसे के बाद विभाग में आयोजित कार्यक्रम को देखकर सभी खुश थे. प्रस्तुत कार्यक्रम में प्रोफ .ए .पी .सेन गुप्ता , डॉ. मनोज दीक्षित , डॉ.आर .सी.त्रिपाठी और  डॉ .मुकुल श्रीवास्तव मुख्य अतिथि रहे. इस मौके पर बच्चो ने "मार्केटिंग पब्लिक रिलेशन "  की पहुच ओर उससे होने वाले लाभों के बारे में अपने विचार व्यक्त किये . और बच्चो की विचारो को सुनने के बाद वहां मौजूद अतिथियों ने भी अपने विचारों को लोगो के तक पहुचाय.इस अवसर पर पी.जी.डी.पी.आर.ए के छात्र छत्राओ  की ओर से सम्पादित की गई पत्रिका "रिफ्लेक्सन" का विमोचन भी किया गया.उसके बाद सेमिनार के सभी प्रतिभागियों को " certificate" से सम्मानानित किया गया .उन्होंने बच्चो की इस मेहनत और लग्न को देखकर उनके साहस को बढाया और उनके बेहतर भविष्य की कामना की ...

Sunday, March 13, 2011

JEET AAPKI.............: khushiyo ka triple dhamaka...

JEET AAPKI.............: khushiyo ka triple dhamaka...

khushiyo ka triple dhamaka...

दीवाली की पटाखों की गूंज  अभी कान में गूंज अभी कान से खत्मनहीं हो पायी है  की  रंगों ने भी दस्तक देनी शुरू कर दी है ..समय की गति इतनी तेज  लग रही है की मानो वो हमे अपने साथ चलने ही नहीं  देना चाहता.. कभी सोचो तो लगता है की  अभी कुछ ही दिनों पहले ही तो दीयों  की रौशनी ,पटाखों की गूंज थी ..और अब रंगों ने भी आने की जिद्द कर रक्खी है.. वैसे भी ऐसा लगना स्वाभाविक है  क्यूंकि हम सभी जानते है की इस  वर्ष विवाह के मुहर्त बहुत अधिक है और ऊपर  से चार वर्ष के अन्तराल के बाद आया ये  विश्वकप का मुकाबला  वो भी अपने देश में.ऐसा लग रहा जैसे जशन मनाने का सीजन ही चल रहा हो .ऐसे में लोग अपनी ख़ुशी का इज़हार पटाखों से  ही करते है, अब चाहे शादी हो या मैच दोनों ने ही लोगो की खुशियों को दुगना कर रक्खा है.ठीक वैसे ही  जिस तरह  दबंग में मुन्नी के नाम के साथ बाम का साथ था ..अब पटाखे जो है हमरा साथ छोड़ना नहीं चाहते और रंग भी हमारे पास आने का इंतज़ार कर रहे है रंगों की भी अपनी अलग ही कश्मकश है जो इंसानों के असली रंगों को छुपा देता है और अपने रंग में ढाल लेता है.. इन सबको देखकर ऐसा लगता मानो हमारी खुशिया दो गुनी नहीं बल्कि तीन गुनी होने वाली है... इस बार मौका है दिवाली और होली दोनों के जशन को साथ में मानाने का .

Monday, March 7, 2011

"रिश्वत की कुर्सियां "

              
अब तक हमने न जाने अपनी ज़िन्दगी में कितनी ही कुर्सियौं  को देखा होगा ..पर क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की है की असल में इन कुर्सियौं  की कीमत क्या है शायद  अभी भी अप यही सोच रहे होंगे की इसमें जानने जैसी वाली बात क्या है यही कुछ सौ और हज़ार रुपये में मिल जाएगी ये कुर्सिया लेकिन अगर आप यहिब सोच रहे है तो शायद  आप ये भूल रहे है की जिंदगी के मोड़ कभी न कभी हमे कुर्सियौं  की असली कीमत पता चल ही जाती है ...अब अगर हम बचपन से शुरू करे तो एक अच्छे स्कूल में एक मामूली कुर्सी  पाने के लिए न जाने हमे कितने पापड बेलने पड़ते है और रिश्वत में कितने ही पैसे देने पड़ जाते  है सिर्फ पड़ने की एक कुर्सी के लिए...आगे बड़े तो किसी अच्छे कॉलेज में भी एक सीट पाने के लिए न जाने लाखो रुपये  रिश्वत  में दे दिए जाते है. अब अगर हम ये देखे की जब सरकारी नौकरी में भी तो सिर्फ एक सीट पाने के लिए लोग पहले लम्बी लाइन लगाकर फॉर्म भरते है और फिर वहां भी कुर्सी को पाने के लिए लाखो रुपये रिश्वत में देने को हमेशा तैयार रहते है ... अरे भाई इतनी बात करके हम अपने नेताओं  की बात न करे ऐसा  कैसे हो सकता है  उनके लिए उस कुर्सी की कीमत क्या होती है ये तो हम सभी जान सकते है .मुंह में पान दबाये , सफ़ेद कपड़ो में अपने को लपेटे हुए, आँखों में  चश्मा की भले ही keemat मामूली सी हो पर  अपनी एक कुर्सी में मानो उनकी जान अटकी हुई होती है... हाँ वो रिश्वत दे या न दे पर लेते जरुर है ... माने या माने हम लेकिन कुर्सियौं की कीमत  बहुत है  भैया.......