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Tuesday, April 26, 2011

यह कैसा है इन्साफ ? यह कैसी है सजा ???
अभी जब कुछ दिनों पहले जब मैंने अरुणा शानबाग  के बारे में सुना तो काफी दुःख हुआ मन  में वाही सवाल बार  बार आ रहा था जो की सबके मन  में था की किसी बलात्कारी को किसी लड़की की पूरी जिंदगी बर्बाद कर देने के लिए सिर्फ 7 साल की सजा ???? और उसके इस करतूतों की सजा अरुणा  को 37 से  मिल रही है.. वही जब अभी कुछ  दिन पहले गोपालदास 27 साल बाद पाकिस्तान से अपने वतन लौटे जिन्होंने गलती से अपने देश की सीमा लांघी थी उन्हें पाक अदालत ने उम्र कैद की सजा मुक़र्रर कर दी गयी थी .
जहाँ  एक तरफ वो बलात्कारी जिसने सिर्फ अपनी मर्ज़ी से इतनी बड़ी गलती करके अरुणा को मौत के मुंह  में धकेल के सिर्फ  कुछ सालो की सजा काट कर भी बेख़ौफ़ आज़ाद घूम रहा है..और दूसरी तरफ वो  गोपालदास जिसने  गलती से गलती की उसे अपने परिवार वालो से पुरे 27 साल के लिए दूर कर दिया गया था .और वापस आने पर पूरे मीडिया वालो ने उसे अपनी खबर के लिए निशाना बना लिया और और दूसरी तरफ वो बलात्कारी जिसके बारे में कुछ भी लोगो को तो क्या मीडिया को भी कुछ नहीं पता . दोनों ही मामलो में सजा तो मिली है गलती करने वाले को  लेकिन क्या ये दोनों सजा मानवीय (सही) है क्या इसी तरह की सजा अगर असली मुजरिम को मिलती रही तो वो कही न कही निडर हो जायेगा ..ये कैसा इन्साफ है?? मुजरिम को मिलने वाली ये कैसी सजा है..???

Tuesday, March 22, 2011

भारत सरकार के ऊपर "साड़े साती "

मुझे बक्श दो ...........मैंने कुछ नहीं किया मैं बेक़सूर हूँ.........!!!!
पिछले साल से अब तक हो रहे एक के बाद एक भारत सरकार की करतूतों के खुलासे फिर चाहे वो  ऐ.रजा का "2जी स्पेक्ट्रम  आंवटन" हो या सुरेश कलमाड़ी का  "कॉमनवेल्थ गेम्स"हो या पीजे  थामस का "सीवीसी" मामला हो या फिर अब अखबारों और समाचारों  में सुर्खिया बटोरने वाला हमारे प्रधानमंत्री का "नोट के बदले वोट" मामला मानो भारत सरकार के ऊपर "साड़े साती " चल रहा हो.
सरकार की इन करतूतों की खिचड़ी बनते देख विकिलीक्स ने भी कई खुलासे करके खिचड़ी को और ज्यादा स्वादिष्ट बनाने  के लिए छौके का काम कर रहा है ..इन सभी खुलासे के बाद आम जनता भी आगे से सोचने पर मजबूर हो जाएगी की कौन  सही है कौन  गलत,किसको वोट देना है किसको नहीं . शुरू से अमेरिका की हमारे देश में दखलंदाज़ी दे  रहा  है.तथा उन्ही के बताये नक़्शे कदम पर अधिकांश सरकारे अपने आपको चला रही है .इससे तो यही पता चल रहा है की  हम अपने आपको कमजोर  दिखाना चाह रहे है इन सभी से  न सिर्फ  हमारे देश के नेता तो बिक  गए है.बल्कि देश की जनता काफी प्रभावित  हुई है.इन बातो का खुलासा विकिलीक्स द्वारा कई बार हुआ है  अमेरिका ने  साफ़ कहा है की  वित्त मंत्री प्रणब मुख़र्जी उन्हें पसंद नहीं है. वो वित्त मंत्री के रूप में  चितंबरम या मोंटेक सिंह आहलुवालिया को देखना चाहते थे .अमेरिका का इस तरह का हमारे देश में हस्तछेप.और कुछ हमारे देश के महान नेता लोग जो पता नहीं कितना पैसा कमाना चाहते है देश को खोखला कर दिया है ..इन सभी बड़े बड़े हादसों  के बाद तो लगता है की  जल्द ही भारत सरकार को किसी अच्छे पंडित को खोज कर अपने ऊपर चल रहे "साड़े साती" को हटवाने के लिए पूजा करानी होगी  होगा ताकि वो दोबारा अपने काले  काम का काला धन को पाने में सफल हो सके .... 

Thursday, March 17, 2011

जियो और जीने दो ....

"पैसे वालो फिर न करो यूँ अपनी नियत खोटी,मत निकालो ऐसे एक्स्चेंग ऑफर की छीन जाए हमारी रोजी रोटी " पहले आने वाला relience का सब्जी मार्केट हो या अब लोगो के बीच अपनी जगह बनाने वाला बिग बाज़ार का क्स्चेंग ऑफर.हो न हो दोनों ने कहीं न कहीं गरीबो की रोजी रोटी पर  मानो ग्रहण सा लगा रक्खा है.
आज सवेरे ही पापा ने जब रोड पर जा रहे  किसी कबाड़ी वाले को  कबाड़ का सामान देने के लिए आवाज़ लगाईं तो उसके मासूमियत भरे चेहरे और दर्द से केवल एक ही आवाज़  सुनाई दी "कि इन बिग बाज़ार वालो के  एक्स्चेंग ऑफर ने हमारा सारा धंधा चौपट कर दिया है बड़े लोगो ने घोटालो से पूरे देश को लूटने के बाद अब हम गरीबो को भी लूटने कि शाजिश बना ली है  हमारी थोड़ी सी कमाई पर भी मानो उनकी नियत कि खोट  नज़र आ रही है" और आम लोग भी हम गरीबो को लूटने में उन पैसे वालो  का पूरा साथ दे रहे हैं..
    बात तो कही  न कहीं सही भी है अब लोगो का इंटेरेस्ट  9 रुपये किलो के अखबार से ज्यादा 35 रुपये किलो के अखबार में ज्यादा होगा..कुछ भी हो जनाब! पैसा हर जगह बोलता है  पैसा कभी किसी को काटता नहीं है फिर चाहे वो अमीर का हो या गरीब का और जिसके पास जितना हो उतना ही कम रहता है.. हर कोई अपना ही फायदा चाहता है  अब देखो बिग बाज़ार  वाले अपने फायदे के लिए कबाड़ भी लेना शुरू कर दिए,तो बिग बाज़ार वाले तो सबसे बड़े कबाड़ी है और लोग  अपने फायदे के लिए उनको कबाड़  भी दे  रहे है  लोग अभी भी  इसी मुगालते में रह रहे है कि उन्हें कबाड़ कि जगह अच्छे.ब्रांडेड  कपडे मिल रहे है भले ही उससे ज्यादा पैसा मिलाकर ही क्यों न खरीदना पड़े..फिर अगर वो किसी शौपिंग मॉल से ख़रीदा हो तो फिर  लोगो के बीच अपनी कुछ अलग ही पहचान बनाने का तरीका का ..और लोगो को ये अच्छा भी लगता है वो इस बात से अनजान बनने कि कोशिश करते है कि घर से बिगबाजार तक अपने कबाड़ को ले जाने में उनका कितना पैसा खर्च हुआ . 
वैसे लोग भी कम चालाक नही है  वो यही चाहते है कि एक तीर से जितने ज्यादा निशाने लगे उतने लगा ले ..
फिर ऐसे तो उन्हें एक तीर से  तीन निशाने लगाने मौका मिल रहा है तो वो चूंक कैसे सकते है . पहला तो घर का कबाड़ भी साफ़ हो जाएगा ,दूसरा  मॉल का मॉल भी घूम लेंगे और तीसरा हाई-फाई जगह से कपडे भी खरीद लेंगे...जो सबके लिए थोडा मुश्किल होता है कि ऐसी हाई-फाई जगह से कपडे  या फिर कोई और सामान खरीदना  ऐसे में तो भैया आपकी रोजी रोटी में ग्रहण लगना स्वाभाविक है...
हम तो भैया यही कहेंगे रोड पे उन कबाड़ खरीदने वाले लोगो से कि अपने हक़ के लिए लड़ना सीखो.. जिस तरह जाट लोग अपने आरक्षण के हक़ के लिए लड़ रहे है .. तुम्हे भी ये सीखना पड़ेगा .. वो कहते है न " जहाँ सच नहीं चले वहां झूठ  सही, और जहाँ हक़ न मिले वहां लूट सही "  

Tuesday, March 15, 2011

seminar on "the power of marketing public relation"......

14 मार्च लखनऊ ! लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में  पी.जी.डी.पी.आर.ए के छात्र छत्राओ ने भव्य सेमिनार का आयोजन किया .
बीते दिन लखनऊ विश्वविध्यालय के  अध्यापक ए.के सेठ के सहयोग से  पी.जी.डी.पी.आर.ए के छात्र छत्राओ  द्वारा आयोजित सेमिनार में  " द पावर ऑफ़ मार्केटिंग पब्लिक रिलेशन " आधार बनाया गया .एक लम्बे अरसे के बाद विभाग में आयोजित कार्यक्रम को देखकर सभी खुश थे. प्रस्तुत कार्यक्रम में प्रोफ .ए .पी .सेन गुप्ता , डॉ. मनोज दीक्षित , डॉ.आर .सी.त्रिपाठी और  डॉ .मुकुल श्रीवास्तव मुख्य अतिथि रहे. इस मौके पर बच्चो ने "मार्केटिंग पब्लिक रिलेशन "  की पहुच ओर उससे होने वाले लाभों के बारे में अपने विचार व्यक्त किये . और बच्चो की विचारो को सुनने के बाद वहां मौजूद अतिथियों ने भी अपने विचारों को लोगो के तक पहुचाय.इस अवसर पर पी.जी.डी.पी.आर.ए के छात्र छत्राओ  की ओर से सम्पादित की गई पत्रिका "रिफ्लेक्सन" का विमोचन भी किया गया.उसके बाद सेमिनार के सभी प्रतिभागियों को " certificate" से सम्मानानित किया गया .उन्होंने बच्चो की इस मेहनत और लग्न को देखकर उनके साहस को बढाया और उनके बेहतर भविष्य की कामना की ...

Sunday, March 13, 2011

JEET AAPKI.............: khushiyo ka triple dhamaka...

JEET AAPKI.............: khushiyo ka triple dhamaka...

khushiyo ka triple dhamaka...

दीवाली की पटाखों की गूंज  अभी कान में गूंज अभी कान से खत्मनहीं हो पायी है  की  रंगों ने भी दस्तक देनी शुरू कर दी है ..समय की गति इतनी तेज  लग रही है की मानो वो हमे अपने साथ चलने ही नहीं  देना चाहता.. कभी सोचो तो लगता है की  अभी कुछ ही दिनों पहले ही तो दीयों  की रौशनी ,पटाखों की गूंज थी ..और अब रंगों ने भी आने की जिद्द कर रक्खी है.. वैसे भी ऐसा लगना स्वाभाविक है  क्यूंकि हम सभी जानते है की इस  वर्ष विवाह के मुहर्त बहुत अधिक है और ऊपर  से चार वर्ष के अन्तराल के बाद आया ये  विश्वकप का मुकाबला  वो भी अपने देश में.ऐसा लग रहा जैसे जशन मनाने का सीजन ही चल रहा हो .ऐसे में लोग अपनी ख़ुशी का इज़हार पटाखों से  ही करते है, अब चाहे शादी हो या मैच दोनों ने ही लोगो की खुशियों को दुगना कर रक्खा है.ठीक वैसे ही  जिस तरह  दबंग में मुन्नी के नाम के साथ बाम का साथ था ..अब पटाखे जो है हमरा साथ छोड़ना नहीं चाहते और रंग भी हमारे पास आने का इंतज़ार कर रहे है रंगों की भी अपनी अलग ही कश्मकश है जो इंसानों के असली रंगों को छुपा देता है और अपने रंग में ढाल लेता है.. इन सबको देखकर ऐसा लगता मानो हमारी खुशिया दो गुनी नहीं बल्कि तीन गुनी होने वाली है... इस बार मौका है दिवाली और होली दोनों के जशन को साथ में मानाने का .

Monday, March 7, 2011

"रिश्वत की कुर्सियां "

              
अब तक हमने न जाने अपनी ज़िन्दगी में कितनी ही कुर्सियौं  को देखा होगा ..पर क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की है की असल में इन कुर्सियौं  की कीमत क्या है शायद  अभी भी अप यही सोच रहे होंगे की इसमें जानने जैसी वाली बात क्या है यही कुछ सौ और हज़ार रुपये में मिल जाएगी ये कुर्सिया लेकिन अगर आप यहिब सोच रहे है तो शायद  आप ये भूल रहे है की जिंदगी के मोड़ कभी न कभी हमे कुर्सियौं  की असली कीमत पता चल ही जाती है ...अब अगर हम बचपन से शुरू करे तो एक अच्छे स्कूल में एक मामूली कुर्सी  पाने के लिए न जाने हमे कितने पापड बेलने पड़ते है और रिश्वत में कितने ही पैसे देने पड़ जाते  है सिर्फ पड़ने की एक कुर्सी के लिए...आगे बड़े तो किसी अच्छे कॉलेज में भी एक सीट पाने के लिए न जाने लाखो रुपये  रिश्वत  में दे दिए जाते है. अब अगर हम ये देखे की जब सरकारी नौकरी में भी तो सिर्फ एक सीट पाने के लिए लोग पहले लम्बी लाइन लगाकर फॉर्म भरते है और फिर वहां भी कुर्सी को पाने के लिए लाखो रुपये रिश्वत में देने को हमेशा तैयार रहते है ... अरे भाई इतनी बात करके हम अपने नेताओं  की बात न करे ऐसा  कैसे हो सकता है  उनके लिए उस कुर्सी की कीमत क्या होती है ये तो हम सभी जान सकते है .मुंह में पान दबाये , सफ़ेद कपड़ो में अपने को लपेटे हुए, आँखों में  चश्मा की भले ही keemat मामूली सी हो पर  अपनी एक कुर्सी में मानो उनकी जान अटकी हुई होती है... हाँ वो रिश्वत दे या न दे पर लेते जरुर है ... माने या माने हम लेकिन कुर्सियौं की कीमत  बहुत है  भैया.......

Thursday, March 3, 2011

"एक छोटी सी मुलाकात ईशा के साथ "

  21 मई 1986 , को लखनऊ में जन्मी ईशा अग्रवाल जो इस समय लखनऊ विश्वविध्यालय की पत्रकारिता विभाग की छात्रा है जिन्होंने एक छोटी सी  मुलाकात  में अपनी ज़िन्दगी के कुछ खट्टे मीठे पलों  को हमारे साथ बांटा....

आप लखनऊ में कैसे आई ?
  मेरे घरवाले यही के है और क्यूंकि मेरा जन्म भी लखनऊ शहर में हुआ है और तब से लेके अब तक मैं लखनऊ में ही रह रही हूँ.

अपनी परिवार के बारे में कुछ बताये .
  मैं शुरू से ही जोइंट फॅमिली में रही हु.

आपको जोइंट फॅमिली में रह कर कभी कोई प्रॉब्लम नहीं हुई?
  चाहे फॅमिली सिंगल हो या जोइंट , थोड़ी बहुत प्रॉब्लम तो हर घर में  होती है लेकिन फिर भी हम सारे बहुत ख़ुशी के साथ एक घर में रहते है. 

आपकी नजरो में किसी भी रिश्ते को मेनटेन रखने के लिए सबसे ज्यादा  क्या जरुरी है? 
  "only trust forever lasting relationship"......विशवास और प्यार ! मेरी नजरो में किसी भी रिश्ते को मेनटेन रखने के लिए सबसे ज्यादा एक दुसरे पे पूरा विशवास होना चाहिए जिससे प्यार बढेगा और रिश्ता अपने आप ही मेनटेन हो जायेगा . 

दोस्ती का मतलब क्या है ?
  दोस्ती एक मीठा एहसास है और मेरी ज़िन्दगी मेरे दोस्तों के बिना अधूरी है .

आपने स्कूलिंग कहा से और कैसे की ?
  मैंने लखनऊ के ही लालबाघ गर्ल्स इंटर कॉलेज में शुरू से लेके 12th तक पढाई की और मैं शुरू से ही बहुत friendly  रही हूँ  जिस वजह से मैं हर किसी भी तरह के लोगो से बात करके अपने को अर्जेस्ट  कर  लेती  थी.

आपने मीडिया लाइन में ही अपना करियर बनाने के लिए क्यों सोचा ? 
  क्यूंकि शुरू से ही मुझे लिखने ,बोलने का  बहुत शौक था..जो बात मुझे 10th में पता चली .. बाद में एम् .ए करते वक़्त मैंने २ बार mjmc में ट्राई किया लेकिन  एक साथ दो पी. जी कोर्स करना संभव नहीं था जिस वजह से मैं नहीं कर पायी एम्. ए के बाद मैंने "o" लेवल कंप्यूटर कोर्स किया और उसके बाद 2010 में मैंने  mjmc मे प्रवेश लिया. 

इस field में अभी तक आने के बाद कोई ऐसा काम जो आपको लगता हो की आगे चलकर आप नहीं कर सकती ? 
   फिलहाल , अभी मुझे  इस field में आ के ज्यादा समय नहीं हुआ है मुश्किल से सात - आठ महीने ही हुए है .अभी मैं काफी कुछ सीख  रही हूँ और काफी कुछ सीखना बाकी है इसलिए अभी मैं जो कुछ सिख रही हु उसपे concentrate कर रही हूँ की उस काम को और ज्यादा अच्छे से कैसे करूँ और उसी काम में अपने आपको मांझने की कोशिश कर रही हूँ और अभी आगे बहुत कुछ सीखना बाकी है तो अभी ये कहना मुश्किल होगा की आगे क्या होने वाला है .

मुकुल सर के बारे में कुछ बताएं .
  मुकुल सर , बहुत ही coporative टीचर है .बहुत अच्छे है ./और सबसे बड़ी बात वो यह की वो जिस तरह से क्लास में अपने आपको  को उदाहरण देकर समझाते है उनकी वो ishtyle बहुत अच्छी लगती है उनमे कुछ नेगेटिव है ही नहीं जो मैं आपको उनकी कमी में बताऊँ.

आप  अपना आदर्श किसे मानती है ?
   किसी को भी नहीं !!! जिसकी जो भी अच्छी आदत होती है मैं उसे पूरे  मन से सिखने की कोशिश करती हूँ इसलिए किसी एक  का भी नाम लेना मुश्किल है मेरे लिए .

आपकी शक्ति और कमजोरी क्या है ?
  मेरे emotions जिनसे मैं अपने आपको बहुत ज्यादा स्ट्रोंग फील करती हूँ ,लेकिन कभी कभी यही emotions मेरी कमजोरी बन जाते है .

आपकी कोई सबसे गन्दी आदत.
  हँसते हुए!  यह तो आप लोगो को ही पता होगी की मेरी गन्दी आदत क्या है , वैसे मेरे दोस्त कहते है की मैं बहुत हंसती हूँ शायद यही मेरी सबसे गन्दी आदत है .

ज़िन्दगी में कभी असफल हुई हैं अगर हां तो उस समस्या का कैसे सामना किया ?
  "touch wood " कहते हुए !!!अभी तक ऐसा नहीं हुआ , हां जब मैंने पत्रकारिता ( MJMC) में प्रवेश करने के लिए  तीन बार कोशिश की लेकिन हर बार किसी न किसी समस्या की वजह से मुझे सफलता नहीं मिली लेकिन फिर भी मुझे विशवास था की एक दिन मेरा ये सपना भी पूरा हो जायेगा जो अब पूरा  हो गया ...

आप की नज़रो में अब तक की आपकी सबसे बड़ी सफलता क्या है ?
   दोस्त सिर्फ दोस्त !!!!! जो मेरी लाइफ के best achievement है मुझे अच्छा लगता है की वो  लोग मुझपर  बहुत विशवास करते है और मैं उनपर .. धोखा देने वाले लोग मुझे बिलकुल पसंद नहीं है.

आपके  aim  तक पहुचने में कोई ऐसी  समस्या जो आपको लगता हो आगे चलकर इस समस्या का सामना आपको करना पड़ सकता है  ?
   समस्या तो हर जगह होती है मुझे यह नहीं देखना है की समस्या क्या है बल्कि ये देखना है की उस समस्या का समाधान क्या है .

कोई ऐसा incident जब आपको खुद पर हंसी आई हो ?
   हँसते हुए कहती है !! अक्सर आती है . जब कोई घर पर मेरा मजाक उड़ाता है .

अगर भविष्य में आपको वो नौकरी मिले जो आप पाना चाहती है तो आप अपने पुराने competitors को क्या सलाह देंगी ?
   प्रिंट मीडिया तो मैं अभी एक ही बात कहूँगी जो मुकुल सर कहते है की "लिखना लिखने से आता है इसलिए लिखते रहो और अच्छा लिखने के लिए अच्छा  पड़ना जरुरी है इसलिए पड़ते रहो" ..और बाकी जो मैं आगे सीखती जाउंगी वो बताती जाउंगी .

कौन सी चीजे है जिन्हें आप भविष्य  में अपने पास चाहती है ?
  सबसे पहले मैं एक अच्छा इंसान बनना चाहती हूँ उसके बाद वो जो हर कोई चाहता है ..नेम ,फेम , boyfriend.

क्या आप ऐसे लड़के को अपना boyfriend बनायेंगी जो पैसे वाला हो ? 
  जैसे हर किसी के मन में कोई  न कोई बाते होती है जो वो अपने सामने वाले में देखना चाहता है ..वैसे मेरे भी मन में कुछ पॉइंट है जब उन पॉइंट से मैच करता  हुआ जो मेरे सामने आयेगा उसे बनाउंगी . पैसे वाला हो ये जरुरी नहीं है .....


                                                                                                                                       अनुभा गुप्ता .

















Thursday, February 17, 2011

उफ़ ये बच्चे .

लखनऊ ( 17 फरवरी ) ! आज मार्केट में एक मम्मी बहुत परेशान दिख रही थी....क्यूंकि  बेटे ने अपने स्कूल किसी बच्चे के पास  कोई  नयी  technology  की पेंसिल  थी ..और उसकी जिद्द थी की उसे वाही पेंसिल चाहिए ..और मम्मी को वो पेंसिल नहीं  मिल रही थी... इसलिए दोनों परेशान थे.... बेटे को पेंसिल नहीं मिल रही थी इसलिए और मम्मी बेटे की जिद्द से थी परेशान ....उफ़ ये नए नए technology ..और उफ़ ये बच्चे ....

Wednesday, February 16, 2011

सड़क से मंजिल की ओर....................

.कभी इस गली तो कभी उस गली ,कभी इस मोहल्ले तो कभी उस मोहल्ले ,कभी इस शहर  तो कबी उस शहर,जगह चाहे कोई भी भी क्यों न हो हर जगह पहुचने वाली सिर्फ सड़क ही होती है...रोज़ न जाने कितने मुसाफिरों को ये अपनी मंजिल से पहुचती है कभी सोचो तो कितना अजीब लगता है की एक ही सड़क में चलने वाले कितने मुसाफिर होते है ओर जब वो इन सड़क  से अपने मंजिल की ओर  जाते है अलग अलग विचार उनके मन  में आते है.. वैसे अगर कहा जाए तो ये भी सही होगा की अगर हम अकेले इन सडको पे चल रहे है ...तो हमे अपने आपसे बात करने का सबसे सही मौका यही मिलता है ...
हर रास्ते में कुछ समय बाद मोड़ आते है ठीक वैसे ही जैसे हमारी ज़िन्दगी में उतार चड़ाव आते है पर हमे ही ये तय करना होता है की कौन सा मोड़ हमे हमारी मंजिल तक पहुचायेगा ....वैसे ही जैसे मुश्किल वक़्त में हमे ये तय करना होता है कौन सा हमारी ज़िन्दगी का सही फैसला होगा....अगर हम अपनी ज़िन्दगी की परिसिथितियो  को  इस सड़क के पहलू से देखे तो ये गलत नहीं होगा हमारी ज़िन्दगी भी कहीं न कहीं इन्ही सड़क की  मोड़ की तरह है............ 

Sunday, February 13, 2011

ये  SAALI  ज़िन्दगी ...............!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
न जाने क्यों जब कभी मै आरुषि की अनसुलझी  कहानी के बारे में पढती या सुनती हूँ तो ऐसा लगता है उसकी मासूम सी आंखे कुछ  कहना चाहती है  ऐसा  लगता है आरुषि अभी अपने कातिल का नाम बता देगी लेकिन असल ज़िन्दगी में कहा यह  सच होता है.... जाने इन 2 सालो में कितने लोगो से CBI ने पूछताछ की लेकिन उनके हाथ सिर्फ नाकामी ही  लगी है ....सीबीआई का तलवार परिवार के उपर इलज़ाम लगाना ऐसा लगता है जैसे "घड़ी की सुई एक बार 12 से घूम कर दोबारा 12 पे आ के रुक गयी है"....आज आरुषि की मौत की कहानी देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री बन गयी है ....आज लगभग देश का हर  इंसान यही जानना चाहता है की आखिर किसने किया इस मासूम की हत्या......???????
"ज़िन्दगी का सफ़र इतना छोटा होगा यह सोचा न था ...
सारे सपने खिलौने की तरह टूट जायेंगे यह सोचा न था ....
दिल करता है की ईशवर से दो पल की ज़िन्दगी उधार लूँ ....
बता कर अपने कातिल का नाम अदालत से इन्साफ मांग लूँ..."

Monday, February 7, 2011

पुस्तक मेले प्रबंधको की लापरवाही और लोगो की भारी कमी के कारण संसथान के आयोजक हुए नाराज़....
7 फरवरी  लखनऊ: लखनऊ विश्वविध्यालय में नेशनल बुक ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश संसथान के सहयोग से  राष्ट्रीय पुस्तक मेले का आयोजन किया...
5 फरवरी  से १३ फरवरी  तक चलने  वाले इस पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन समूह, international योग सोसाइटी,आर्य प्रकाशन , मरकजी  मकतबा इस्लामी पब्लिशेर्स ,विश्व बुक्स, राष्ट्रीय संस्कृत  संसथान, जनचेतना, अमर स्वामी प्रकाशन विभाग,सत्य मंदिर , virtous पुब्लिकतिओन ,राधाकृष्णन , अरिहंत , देहली पुब्लिकतिओन्स जैसे लगभग १६० संस्थानों ने भाग लिया ....नौ दिन ले इस आयोजन में दो दिन बीतने पर आयोजको और वितेरेको के अनुसार लोगो में पुस्तकों के प्रति कोई ख़ास दिल्चिस्पी नज़र नहीं आई....कुछ के अनुसार जो क्रेज़े और रूचि और पुस्तक मेलो में नज़र आता है वो पुस्तकों के लिए प्रेम यहाँ नहीं देखने को मिल रहा है
और कुछ के मुताबिक़ लोगो में आज भी पुस्तकों को लेकर प्रेम नज़र आ रहा है.... पुस्तक खरीदारों के अनुसार यहाँ नन्हे बच्चो को टार्गेट बना कर पुस्तकों के संग्रह को लाया गया है जिनसे तस्वीरों के माध्यम से बच्चो को आसानी से पडाया  जा सके...वहीँ दूसरी  तरफ महिलायों  की स्थिति का  चित्रांकन कर पुस्तकों पर जादा जोर दिया गया है .....और हमारी सामाजिक स्थिति को प्रदर्शन करते हुए हिंदी उर्दू शब्दकोष की पुस्तकों को जादा महत्त्व दिया गया है....दलित साहित्यों की भरमार है 
आर्य प्रकाशन डेल्ही के श्री संजीव आर्य का कहना है की आज के इस युग में वेदों की पुस्तकों की मांग बढ रही है....और यूथ लोग में वेदों को जानने की रूचि साफ़ नज़र आ रही है ...उनके अनुसार कई लोग ऐसे भी आये जिन्होंने पहली बार इन वेदों की पुस्तकों को देखा और सराहा ....संजीव जी के अनुसार डेल्ही की अपेक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय के बच्चो का पुस्तकों के प्रति अधिक रूचि देखने को मिल रही है...वेदों में "सत्यार्थ" जैसी पुस्तकों की पुरे विश्व में मांग है ...दानिश बुक डेल्ही के वीरा दार जी के अनुसार उनका मकसद अपनी पुस्तल "जुबां" जो की लिंग issue पर आधारित है..,"तुलिका" इतिहास से प्रेरित होकर..,"कॉर्नर stone ","अनामिका" आदि को सिर्फ लोगो के बीच ले जाना है ना की पुस्तकों का व्यापार करना ....ऊ उनके अनुसार आज भी बछो में "हर्री पोट्टर " ,"गाना स्टील" और रोमांटिक नावेल की मांग तेजी से है .... जनचेतना की आयोजक शालिनी के अनुसार बेह्टर ज़िन्दगी का रास्ता बेह्टर पुस्तक से होकर जाता है ...और बीते दो दिनों में "फांसी वाद" और "जातिवाद" जैसे उपन्यास भी रूचि का केंद्र बने हुए है...वही दूसरी ओर आयोजक श्री सुनील मिश्र  जी  जिनकी technical issue  पर पुस्तकों की संसथान है के अनुसार अब तकनीकी नालेज के ज्ञान को लेना जरूरी नहीं है ....जितना BCA,MCA,MBA  जैसी पुस्तकों का ज्ञान लेना...
तिवारी प्रकाशन के श्री अवधेश तिवारी जी जो सरकारी आंकड़ो को अनाल्यिस कर पुस्तक को पब्लिश करते है जैसे "panpering corparate", "two decades of niewlism" ओर सही आंकड़े लोगो तक पहुचे इसके लिए ये इन पुस्तक मेलो का सहारा लेते है .    परन्तु बीते दो दिनों के लिए उनका कहना की लगता है की लोग आये ही नहीं हा ओर शायद कही न खाई लोगो को यहाँ तक पहुचने में काफी असुविधा हो रही है ..
लखनऊ विश्वविध्यालय के  संस्कृत विभाग के डॉ श्री एस . पी .सिंह ओर श्री आर . बी. दुबे  जी का कहना है संकृत पुस्तकों की मांग तो है परन्तु यहाँ कुछ ये पुस्तक मेला फीका सा दिखाई पड़ रहा है..पुस्तक प्रेमी,और विद्वान लोग अपने घरो से ही नहीं निकल रहे है जिस वजह से पब्लिशेर्स काफी नाराज है ....
यहाँ ये सोचना गलत नहीं होगा की आखिर इस नौदीवसीये आयोजन की तारीख  ५ फरवरी  से १३ फरवरी  तक क्यों रखी गई ???? ठीक valentine डे के एक दिन पहले तक?????  नया ग्यानुदय के पब्लिशेर्स के अनुसार उन्होंने अपने प्यार को पुस्तक के series के रूप में प्रकाशित किया है...ताकि यूथ लोग प्यार के इस दिन वो अपने साथी को तोहफे के रूप में ऐसी पुस्तकों , नोवेल , और अन्य उनकी पसंदीदा पुस्तकों को दे सके...वहीँ विश्व बुक्स की रीता शर्मा का यहाँ का माहौल  कहना है की हमे नहीं लगता की हमारे पंडाल के पैसे तक की भी यहाँ आमदनी हो पाएगी...हमे दर है की कही किराया भी हमे अपनी जेब से न देना पड़े.....
 आयोजक इम्तियाज़ अहमद जी के अनुसार आज के यूथ में उर्दू को जानने , लिखने का भी काफी क्रेज दिख रहा है लोगो में उर्दू शब्दकोष की पुस्तकों के प्रति रूचि साफ़ नज़र आती है..फिर जो उम्मीद उन्हें उर्दू के लिए लखनऊ के निवासियों से थी वो पूरी नहीं हुई...इससे ज्यादा अच्छा परिणाम उन्हें उर्दू के लिए दिल्ली में मिला...
जहा हर संस्थानों में सिर्फ बच्चो ,साहित्यों, उपन्यासों ,नोवेल,योग, और वेदों जसी की भीड़ है वही उसी भीड़ में एक संस्था ऐसी भी थी जिनकी पुस्तकों का  उद्देश्य केवेल इंसान को सही मायने में इंसान बनाना है...आध्यात्मिक प्रकाशन की  मंजू अरोरा, लक्ष्मी यादव, उर्मिला पंथ जी के अनुसार उनकी पुस्तकों का एक मात्र उदेद्देश्य है की देवी माँ के द्वारा दिया गया सन्देश लोगो तक पहुचाना और धरम का प्रचार प्रसार  करना....
पुस्तक खरीदने आये लखनऊ विश्वविद्यालय के श्री रितेश चोधरी के अनुसार यहाँ और मेलो की अपेक्षा पुस्तकों का संग्रह कम है ....फिल्म, मीडिया, सिनेमा जैसी पुस्तकों की भारी कमी है ...और कही तो पुस्तकों के मूल्य भी बहुत है..जिनको खरीद पाना सभी के बस में नहीं है...और जिन पुस्तकों के मूल्य कम है वो पुस्तके content  wise ज्यादा कुछ ख़ास नहीं है ...और जो content wise अच्छी है उनके मूल्य अधिक है...उनके अनुसार प्रवेश द्वार में 10 प्रतिशत छूट लिखे होने के बावजूद या तो पुस्तकों में पर्याप्त छूट नहीं है या फिर अगर है तो ३० से  ५० प्रतिशत तक छूट दी जा रही है...पुस्तकों खरीदारों से पूछने  पर की इस पुस्तक मेले में लोगो की भारी कमी का कारण तो उनका यही कहना था की बहुत इस पुस्तक मेले का प्रचार प्रसार में कमी , यहाँ के लोकेशन में कमी जिससे लोग जल्दी यहाँ तक नहीं पहुच पाते या फिर बहुतो को तो इस राष्टीय पुँस्तक के मेले के बारे में पता ही नहीं होता.... लोगो के अनुसार सुरक्षाकर्मी की भी कोई ख़ास व्यवस्था नहीं है 

Thursday, January 27, 2011

तिरंगे का अपमान या सम्मान 
"विजय विश्व तिरंगा प्यारा झंडा उंचा रहे हमारा "
    इन पंक्तियों कितनी वास्तविकता है ये हम पुरे साल में दो दिन  गद्तंत्र और स्वतंत्रता दिवस को छोड़कर जान सकते है जिस तिरंगे को लोग अपनी झूठी शान के लिए फ़हराते है उन दो दिनों के बाद इसकी क्या दुर्दशा होती है ये सब जानते है....ये लोगो की धूल  के सामान हो जाता है..या फिर कभी  मंदिरा बेदी जैसी नायिका की साडी पर पैरो की तरफ लहराता  नजर आता है.. या कभी लोगो की गाडियों के कुचला जाता है तो कभी कूड़े के डिब्बे में फेका हुआ नज़र आता है...क्या ये सिर्फ है लोगो की झूठी शान या फिर है  हमारे तिरंगे  की पहचान .......!!!!!!!!!!!!!!